#Kavita by Surendra Kumar Arora

हिंदी दिवस के लिए

रात अंधियारी है को कोसकर जो बैठे रहें हम
उजियारा चाहकर भी न झाँक अंदर आने पायेगा
जो आ भी गया उजियारा, अपनी बारी के साथ
बंद खिड़कियों के बाहर से लौट चला जाएगा

मिल रहीं हों नाकामियां हर कोशिश के बाद
कोशिशों का सिलसिला न बंद होना चाहिए
गिरती है बार – बार इक दाने के बोझ से,उन
चीटियों की दमदारी पर यकीन करना चाहिए

सीपियाँ समुंदर की आती नहीं हर बार हाथ में
तो क्या हाथ का इस्तमाल बंद होना चाहिए
हर सीप के मुक्क़दर में होता नहीं मोतियों का साथ
तो क्या समुंदर में उतरने का सिलसिला खत्म होना चाहिए

न सही खिड़कियाँ हर घर में, धुप की फुहारों के लिए
रौशनी के इक कतरे वाला रोशनदान तो होना चाहिए
कोई और बनाये उन .बंद दीवारों में कोई खोल,
खुद में ही सीधी दीवारों पर चढ़ने का हौसलां होना चाहिए.

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

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