#Kavita by Surendra Kumar Singh

हवा

**

इस गन्धिल और शीतल

बहती हुयी हवा का

अपना सरोकार है।

स्पर्श करती है शरीर को तो

अंदर से आती है

डकार

जैसे जी भर के पानी पीने के बाद

अक्सर आया करती है।

हालाँकि अँधेरा है अभी

हवा की इस रौशनी में।

लेकिन शब्दों बनो मत

कि मैं अँधेरा हूँ

तुम अँधेरा नही

मोहरा हो।

शब्द मेरे भी हैं

और सत्ता शब्द की

एक मैंने भी बना रखी है

चाहो तो देख लो

दिखाओ मत।

63 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *