#Kavita by Surendra Kumar Singh

गीत

*

दिल में जज्बात की परछाइयों की बस्ती है

सुर्ख अधरों पे मचलते हुए मौसम की तरह।

 

एक छू लो तो रूठ जाता है

एक मिलते ही मुस्कराता है

एक बैठा हुआ है मन्दिर में

एक खोया हुआ ख्यालो में

दिल में आवाज की सरगोशियों का जंगल है

एक झरने से निकलते हुए

धुएं की तरह।

 

ये मुश्किल से कोई बात किया करता है

एक आवाज का हर जाम पिया करता है

एक गढ़ता है नयी परिभाषा

एक हर ब्याकरण मसलता है

दिल में आवाज की परछाईयों का जंगल है

एक भटके हुए राही के मुकद्दर की तरह।

 

एक को चाँद ने किरणों के हाथ खत भेंजा

एक ने तारों की गुंथी हुयी माला भेजी

एक आवाज का हथियार लिए बैठा है

एक निकले हुए अल्फाज से डर जाता है

दिल में हालात की धड़कन का एक मन्दिर है

एक साजिश में ढहाये गए ढांचे की तरह।

 

एक पल आग की मौजों में मुस्कराता है

एक मौजों के नजारे से सिहर जाता है

एक छिप छिप के वार करता है

एक का वार फिसल जाता है

दिल में तूफान के साये का एक सपना है

एक मुफ़लिस के उजाड़े गए चमन की तरह।

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