#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

घिर गए फिर मेघ काले

प्यास से सूखे धरा के

अधर,तन को चूमने को।

 

उन दरख्तों के भी तो साये नही हैं

बैठ जिनमे वो बुना करती थी सपने

दूर तक फैली निशा कुछ और पसरी

शांत निश्छल गगन से तारे निहारें

लाज की घूंघट की झीनी ओढ़नी से

कह न पायी वो कसक अपने हृदय की

और टूटी,और विखरी,हो गयी छुईमुई सी

ताजगी की झुरकति सम्भावना में

उड़ चली है आस,हैं बोझिल दिशाएं

घिर गए फिर मेघ काले।

 

मेघ का अधरों से चुम्बन रोकने को

बह चली हैं शक्ति के आशक्ति में डूबी दिशाएं

चाँद ने भी मूंद ली आँखे गगन में

जुगनुओं से झिलमिलाते हो गए स्तब्ध तारे

उठ चला है आंधियों का एज बवंडर

हो गए खामोश चहकते परिंदे

और ख़ामोशी ने ली है एक करवट

दृष्टि में जैसे बसा है रेत बंजर

आ न पाएंगे यहां तक घिरे बादल

सोच मन ही मन अब वो अकुला रही है

घिर गए फिर मेघ काले।

 

कालिमा से पत्थरों के पृष्ठ फाड़े

हंस पड़ा जब बीज तो आशा बन्धी है

और जब उसकी हंसी कुछ और खनकी

किस दिशा से आ गयी गन्धिल हवाएँ

गगन में स्तब्ध तारे हंस पड़े हैं

चाँद का चेहरा जरा कुछ और चमका

ऊब की दर्गन्ध की पसरी परिधि में

आश महकी

और वो कुछ कुनमुनाई

सींच लुंगी अब इसे मैं अश्रु जल से

घिर गए फिर मेघ काले।

 

सुरेन्द्र कुमार सिंह चान्स

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.