#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

सपना है,बादल है,मुश्किल है,अनजाना है
जो मेरे संग संग रहता है वो कैसे दीवाना है।

सम्भव है ये सपना सच हो
अनजाना से प्यार लगे
पत्थर की काली आंखों में
सम्भव है फिर प्यास जगे
जीवन है,आशा है,मंजिल है अफसाना है।

सम्भव है ये बादल बरसें
ये मुश्किल आसान लगे
रेत के इस फैले बंजर में
सम्भव है कोई पेड़ उगे
खुशबू है,चाहत है,नग्मा है नजराना है।

आँख से जब जब आंसू छलके
अधरों की मुस्कान है ये
रात के इस सुने आंगन में
झांक रहा वो चाँद है ये
पनघट है,झरना है,घूंघट है शर्माना है
जो मेरे संग संग रहता है वो कैसा दीवाना है।

सुरेंद्र कुमार सिंह चांस

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