#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

शाम सी तुम भी
और तुम्हारी देंह भी
आकाश से बरसती हुई
चांदनी में चमक रही हैं
जादू सा है आंखों में
जिस्म पर हवा की सरगोशी है
अक्सर शाम को परिंदे
लौट आते है घर
आजकी शाम कुछ
बिशिष्ट सी है
सूर्योदय के आभास दिलाती हुयी
देख लो खुद
घर आते परिंदे फिर
उड़ान पर हैं
तुम्हारी चांदनी में
नहाई हुई देह की
रौशनी में।

सुरेंद्र कुमार सिंह चांस

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