#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

इस सुनसान ढलती हुई रात में
सूरज के स्वप्निल सिलसिले है हमारे गीत
हाथ मिलाओ दोस्तों
गुनगुनाओ
मंगल भवन अमंगलहारी।
बसुधैव कुटुम्बकम का तुम्हारा ये आधुनिक संस्करण
विश्व ब्यवस्था विश्व ब्यवस्था
चारो तरफ अफरा तफरी
कहाँ है डोमेस्टिक फीलिंग्स।
इस सुनसान ढलती हुई रात में
सूरज के स्वप्निल सिलसिले है हमारे गीत
न कोइ आगाज
न कोई मकसद
न कोई सरहद
न कोई मकसद
सिवाय प्यार के तुम्हारे
पूछना हो पूछ लो
बुद्ध के बुद्धत्व से
द्रौपदी के नारीत्व से
मनुष्य की बनाई हुई सीमाओं को
हमने बार बार तोड़ा है
ये पूरा आकाश ही नही
पूरी धरती भी हमारी है
तुम्हारे लिये।

सुरेंद्र कुमार सिंह चांस

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