#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

लो उन दिनों की छाया भी
पड़ने लगी है हम पर
जो तुम्हारी मन्नतों में
साथ गुजारने की रही हैं।
ये रहा चँचल मन
अपने स्थायी स्वभाव के साथ
ये रहीं उसकी ढेर सारी कामनाएं
ये रहीं उसकी महत्वाकांक्षाएँ
ये रही सपनों में उगाई हरियाली
ये रहा मनुष्य के कदमों के निशान
हमारे संसार की परिधि पर।
उसके यहाँ आते आते
कितना कुछ बदल गया है ये
उसे तो इतिहास ही भविष्य लगता है
कितना प्रफुल्लित है वो
अपनी भविष्य की यात्रा में
और यहाँ इतना कुछ बदला है कि
वो सोच भी नही सकता
वो सोच भी नही सकता कि
उसकी जटिलतम समस्याओं का
कितना सरल समाधान है यहाँ।
सुरेंद्र कुमार सिंह चांस

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