#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

स्पर्श का आभाष
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तुम्हारे स्पर्श के आभाष मात्र से
कितना कुछ बदल गया है
हवाओं में कहकहों की अनुगूंज है
आकाश झर रहा है प्रेम सा
पत्थर पिघल रहे हैं
पृथ्वी ने ओढ़ ली है हरियाली
और मन्द मन्द मुस्करा रही है।
जाने कितने उदासी के तटबन्ध
टूट टूटकर विलीन होने लगे हैं
तुम्हारे अस्तित्व में।
कभी झांको मेरी आँखों मे
तुम्हारे अलावा है ही क्या इनमें।
कभी झांको मेरे मन मे
पाओगे खुद को ही बदलते हुए
पतझड़ से बसन्त तक।
कभी प्रवेश करो मेरे मष्तिष्क के
इस विशाल संसार मे
प्रवेश से अंत तक का सफर
एक चमकदार रास्ता बन जायेगा।
तुम्हारे स्पर्श के आभाष मात्र से
बदली हुई ये दुनिया
एक एहसास ही तो है।
देखो उचित लगें, उपयुक्त लगे
जरूरी लगे तो एक निवेदन है
एक पल ठहर जाओ मेरे साथ
मेरी दुनिया मे भी कि
बदलने का सिलसिला चलता रहे
तुम्हारे आने जाने की
अनगिनित कहानियों की तरह
एक और दिलचस्प कहानी से
सब संतृप्त हो जाएं।

सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस

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