#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

याद है
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याद है,हम आमने सामने थे
तुम मेरी आँख में अपना प्रतिबिम्ब
देख देखकर मुस्करा रहे थे
मैं तुम्हारी आंख में अपना प्रतिबिम्ब
देख देख कर मुस्करा रहा था
और कुछ लोग समंझ रहे थे
हम एक दूसरे को देखकर मुस्करा रहे हैं
तुम्हारी अपनी दुश्वारियां थीं
और जल्दबाजी भी
मेरी अपनी दुशवारियाँ थीं
और जल्दबाजी भी
मुस्कराते हुए हम जुदा हो गए थे
जाने कैसे लगे तुम खुद को
मेरी आँख में
मुझे तो भा गया था मैं
तुम्हारी आंख में
आज इतने दिनों बाद
याद आयी तो लगा
अभी अभी कल की बात है
एक बार फिर याद से
रूबरू होने की चाहत है
तो चलो ख्वाहिशों की तरह
लगा लेते हैं पंख
और मिल लेते हैं एक बार फिर
मुस्कराते हुये।

सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस

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