#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

चैन भी है

शिकायतें भी है

चाहत का जन्मना भी

चाहत का पिघलना भी

मन्सूबे का टूटना भी

मन्सूबे का बंधना भी

भरोषा भी

भरोषे का टूटकर विखरना भी

समय के पटल पर

जीवन की यह दशा

जैसे कर्नाटक में

शक्तिपरिक्षण।

यकीनन

न कोई हारा है

न कोई जीता है

फिर भी

फिर भी आदमी दुखी है

हारने की तरह

खुश है जीतने की तरह

सुना था

जीवन पानी का बुलबुला है

और यहां तो

बिना पानी का बुलबुला है

शुक्र है

चैन भी है

शिकायतें भी हैं।

 

सुरेन्द्र कुमार सिंह चान्स

 

 

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