#Kavita by Surendra Kumar Singh Chans

गीत

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कैसे प्रेमी हो

ना खुद आते हो

ना मुझको अपने पास आने देते हो।

 

आस लगाये तारे थककर फिर सोने को निकले

चाह ने दिल का साथ न छोड़ा मन फिर फिर मचले

काली काली घिरीं घटाएं जम कर बरसीं इतनी

राहें डूबीं,गलियाँ डुबी,डूबीं जाने कितनी

कैसे राही हो

कैसे प्रेमी हो….

 

हम तो तेरे प्रेम में खोये दुनिया से बेगाने

भटक रहे हैं बुनते रहते मिलन के ताने बाने

एक सदी बीती दूजे ने अपना कदम बढ़ाया

आने के वादे हैं लेकिन अब तक तू ना आया

कैसे दिलवर हो

कैसे प्रेमी हो…

प्रेम के बन्धन में बंधने की सुनी है रीति पुरानी

ये मेरा विश्वास अटल है या मेरी नादानी

गुमसुम गुमसुम ख़ामोशी ने कैसा राग बजाया

हवा में जैसे नाच रही है तेरी सुंदर काया

कैसे रूठे हो

कैसे प्रेमी हो

ना खुद आते हो

ना मुझको अपने पास आने देते हो।

 

 

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