#Kavita by Sushil Rakesh

मेरी गुजरिया

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मेरी गुजरिया नन्हीं मुन्नी

करती रहती चकर मकर

भूख लगे रोती चिल्लाती

बात करो  खूब मुस्काती

 

कंधें पे बैठ डैडी दुलराते

मम्मी बातें कर पतियाती

दादी से हूं हूं कर खूब बोलें

मौसियां  पप्पी ले बहलाती।

 

भैया प्रखर चिपटा कर सोए

वह गुपचुप सो स्वप्न जगाए

ऐसी  है नन्हीं मेरी गुजरिया

सब से अपना काम कराए।

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