#Kavita by Sushil Rakesh

एक पथ पर अकेला

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सीधा समझ कर ठोक दिया

एक कील मुझमें

तड़प गया मन

न जाने किस गली में दर्द की सौगात

लिए डर गया मन

वह तो मां है जिनके सौगात से

बस विचलित हुआ नहीं

दर्द-ए-दिल ने हर करम फरमाए

गुजरिस मां की मैं टूटा नहीं

कील का हर दर्द  का लमहा झेल गया

अपने कलख की लीला किसे समझाऊँ

कोई समाझने वाला ही नहीं

हर कोई  अपने विचरों में भटकाता

भटकते हुए कई पथ नाप डाले

अपनी आत्मा की आवाज पर

मां की बाहों में सिसकता रहा

कोई नहीं किसी का किनारा

बस अपनी सिधाई पर

अकेला चल पड़ा।

बस अकेला चल पड़ा।

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