#Kavita by Sushil Rakesh

सिपहसालार

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कल तलक रिमझिम बारिस की तरह

सिपहसलाहकार थे गगन मंडल

आज खिचिंयाते रेत के रेगिस्तान हैं

जब-जब बादलों ने घेरा

वह मेरे फलसफे दुहराते रहे

खूब फुदकते मेढकों की आवाज

रात भर टर्राती रही

कहीं कोई नहीं/रात पसरती रही

बादलों ने खनकते चौपाल में

चमकती बिजुरिया चमकायी

सब नंगे हो गये जानवरों की तरह

न वह सिपहसालार रहे

न फुदकते मेंढक वह सबके सब

मिट्टी के खुदा जमीदोज हो गये

यह मौकपरस्त लोग मेरे मुखपृष्ठ बने

एक झोंके में फट कर

न जाने कहाँ चले गये

मैं त्यागी सिपहसालारों को खोज रहा हूं

जो मशक्कत की मुद्रा मिटा के चले गये

मैं मिटे अवशेषों की तलाश में हूँ

कि उनके नंगेपन को गंगा में बहा दूं

उन्हें शांति मिलें

ऐ भारत के बाशिंदों

तुम्हें मिल जाएँ तो मुझे खबर करना

मैं जरूर उनके नंगेपन को पवित्र नदी में

प्रवाहित कर दूंगा।

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