#Kavita by Sushila Joshi

कविता …..

व्रीडा

खोया स्वत्व दिवा ने अपना
अंतरतम पीड़ा जागी
घूँघट नैन छिपाए तब ही
धड़कन में व्रीडा जागी ।

अधर कपोल अबीर भरे से
सस्मित हास् लुटाती सी
सतरंगी सी चूनर ओढ़े
द्वंद विरोध मिटाती सी ।

थाम हाथ साजन के कर में
सकुचाती अलबेली सी
सिहर ठिठक जब पाँव बढा
ठाढ़ी रही नवेली सी ।

आयी मन मे छायी तन में
सिहर चौक सब बन्ध गए
हुआ गगन स्वर्णिम आरक्तिक
खग कलरव सब निर्द्वन्द गए ।

चपल चमक चपला सी मन मे
मेरे मन को रोक लिया
कैसे करूँ अभिसार सखी मैं
उसने मुझको टोक दिया ।।

सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर

Leave a Reply

Your email address will not be published.