#Kavita by Sushila Joshi

पतझर याचक बन कर आया
मौसम ने मधुमास दे दिया

फूल हंसे कलियाँ मुस्काई
एक नया सुवास दे दिया
जीवन फिर भी रहा उमसता
थोड़ा सा विश्वास दे दिया ।।।
अत्याचार सहे सर्दी के
ठिठुर गयी थी पूरी धरती
फुटपाथों पर जीवन सोया
बर्फ बर्फ थी सारी परती
उर का दर्द उछल कर आया
फिर से इक आकाश दे दिया ।।

दिन बिताये मेहनत करके
रात अलाव सहारे काटी
अंधो में जब बटी रेवड़ी
तो सबने अपनो में बांटी
पेट कमर से जब जा चिपका
तो केवल उच्छवास दे दिया ।।

पात टूट धरती पर फैले
नग्न हो गयी पूरी काया
पवन दौड़ता अंधड़ बन कर
अंकुरण का जाल बिछाया
नेह ओज की झलकी देखी
तो केवल परिहास दे दिया ।।

निर्झर बहने लगे गीत के
शब्द विहंसे पंक्ति अकुलाई
डाल डाल से फूट मंजरी
महकी गन्ध हुई कसकाई
रंग बिरंगे सपने जागे
एक नया अहसास दे दिया ।।

सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर

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