#Kavita by Sweety Goswami Bhargava

आशा

घेर रखा है मुझको गहन तम ने

फिर भी मुझको भोर की किरण का

होना है प्रभास है मुझको ये आभास

टूटा टूटा होकर भी बाकी है मुझमें

अभी कंही आशा की आस

हार न मानना मन मेरे तू

डर जो बैठा है मन के अंदर

तू इसको मार भगाना

अपने मन के हर कोने में उज्जव्लता

के उजले स्वप्न सजाना

ये जीवन है रणभूमि और

यही है कर्मभूमि

इस रंगमंच पर सबको

अपने अपने किरदार निभाने है।

क्यों बैठो हो तुम थके पथिक से

तुमको निसदिन अपने

कर्त्तव्यों के स्वर्णिम परचम लहराने है।

नही कुछ भी हाथ लगता

कभी मायूस बैठकर ।

हमें आशा के दीप जलाने है।

हमें आशा के दीप जलाने है।

स्वीटी गोस्वामी भार्गव

 

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