#Kavita by Sweety Goswami Bhargava

माँ तो माँ होती है।

उठती हूँ सुबह सुबह कंही जाने के लिए

तो जाती हूँ चाय चढ़ाकर नहाने

जब तक आती हूँ नहाकर चाय जलकर

धुँआ धुँआ होती है

अगर आज होती माँ मेरी तो उसको फ़िक्र होती

वो मेरे उठने से पहले उठ जाती

चुपचाप रसोई में जाकर आटा गूँथने लगती

और मेरे ये कहने पर क़ि माँ क्या जरूरत है

सुबह सुबह परेशान होने की

वो झिड़कती मुझे प्यार से और मेरे गाल को

थप थपाकर बोलती तू जा नहा तुझको देर होगी।

और आवाज लगाकर डाँटती देर होगी

जल्दी कर बेटा और मेरे भागा दौड़ी देखकर

वो गरम चाय को प्याली में फूंक मारकर

ठंडा करके मुझे पकड़ाती और

रोटी एक रोल बनाकर

मुझको जबरदस्ती खिलाती।

नही रहता ध्यान मुझको

अपनी आपा धापी में।

सरका देती टिफिन बैग में मेरे

खा लेना खाना ध्यान से वो जोर से

मुझ पर चिल्लाती।

लौट कर जब आऊ तो सबकी

प्रश्न भरी निगाह होती है

सच है माँ तो माँ होती है

लौट कर आने पर मेरे वो मेरे लिए

कुछ बनाने फिर से रसोई में घुस जाती

ले कुछ खा ले बेटा सुबह से शाम हो गई

ये कहकर प्यार से मुझे समझाती।

हर चाय की चुस्की में घुली होती

मोहब्बत माँ की ।

चाय न फिर धुँआ धुँआ हो पाती।

माँ तो माँ होती है वो सुन लेती है बिन कहे

काश क़ि हर दुआ होती माँ सी

तो मेरी तेरी और सबकी पूरी

कब की हर दुआ हो जाती।

माँ तो माँ होती है।माँ तो माँ होती है।

स्वीटी गोस्वामी भार्गव

 

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