#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

गीत – जीवन यात्रा

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गीत में जितना कहा है !

दर्द उतना ही सहा है !

गाँव से आया निकलकर ,

खोजने को ज़िंदगानी !

देखते शहरी तमाशा ,

लूट गयी सारी जवानी !

अब बुढ़ापा पूंछता है ,

पास तेरे क्या रहा है !

दर्द उतना ही सहा है !!1

धुंध थी पगडंडियों पर ,

खोजता फिरता दिशाएँ !

वेदना का गरल पीकर ,

खा गया संवेदनाएं !

दूब पत्थर पर उगाई ,

रेत का सागर थहा है !

दर्द उतना ही सहा है !!2

पींजरे में सर पटकता ,

मर गया ज्यों एक तोता !

जान पर सहता रहा वो ,

यातना के दंश रोता !

आँख से मालिक कभी ना ,

एक आँसू भी बहा है !

दर्द उतना ही सहा है !!3

शैल कंधों पर उठाए ,

कर रहा है काम सारे !

भाव अंतस में छुपाए ,

मर गए पैगाम सारे !

सेठ बनने की ललक में ,

मान “हलधर” का गहा है !

गीत में जितना कहा है ,

दर्द उतना ही सहा है !!4

हलधर

 

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