#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

सौ बार जनम सौ बार मरण रहा नहीं ठिकाना है

अंतर्मन रही कराह मेरी कब जग ने ये जाना है

 

जग हंसता मैं हंसता हूँ जग रोता तो मैं रोता हूँ

आंसू से है गहरा रिश्ता दामन निज धो लेता हूँ

 

होता पल-पल व्यथित हृदय कौन ये दर्द समझता है

संवेदना शून्य जगत कब कहां हमारी सुनता है

 

मैंने जग को पहचान लिया कोई नहीं मुझे जाना

है भीर बड़ी हीं दुनिया में रह गया सदा मैं अंजाना

 

मन मेरा एक समंदर है ये धरा एक किनारा है

नाविक हूँ मैं पतवार हाथ बस बढ़ना लक्ष्य हमारा है

 

युग-युग क्रांति का ले मशाल मैं जग में आया हूँ

छेड़ प्रणय का मधूर तान गीत क्रांति का गाया हूँ

 

संसार इसे न समझ सका मैं फूल खिलाने आया था

जग बगिया को महकाने हर शूल मिटाने आया था

 

मैं कौन हूँ मुझसे ना पुछो ! पुछो ना मेरा परिचय

ये मिट्टी धूल बता देगी ! देगी तुमको मेरा परिचय

 

जन्मों से मैंने सृजन किया आगे भी सृजन करुंगा

रंग रुप भले बदले मेरा माटी का दर्द हरुंगा

 

इस उपवन की शाखों में खिला हुआ एक फूल हूँ मैं

हूँ डाली से लगा हुआ कब गिर जाऊं वो फूल हूँ मैं

 

बंधा हूँ रिश्तों नातों में होता पल-पल मन अधीर

है कलम बंधी लिखूं कैसे जन गन मन का मैं पीर

 

यही सोच है हृदय विकल कैसे दूं अपना परिचय

रहने भी दो छोड़ो यारों नादां हूँ मैं नाम “उदय”

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उदय शंकर चौधरी नादान , पटोरी दरभंगा बिहार

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