#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

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इस जहां से उस जहां तक मैं जमीं से आसमां तक

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

 

जो भी चेहरों में पढ़ा है उसको कविता में गढ़ा हैं

दर्द जो देखा दिलों में वो सुनाता हीं रहूंगा

 

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता ही रहूंगा

 

जो पीर तुम न पढ़ सके हम उसे न सह सके

मैं जहां के दर्द के छाले दिखाता हीं रहूंगा

 

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

 

प्यार प्रेम श्रृंगारी बातें ऐसी कविता हम ना गाते

आंसुओं से भींगे तन को सहलाता हीं रहूंगा

 

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

 

जिस कविता में ओज नहीं वीर रस वियोग नहीं

समरनायकों की गाथा दोहराता हीं रहूंगा

 

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

 

गांव-गली सड़क सरहद भ्रम भूख भय से लथपथ

खड़े समर में क्रांति का शंख बजाता हीं रहूंगा

 

गीत गाता हीं रहूंगा गुनगुनाता हीं रहूंगा

 

जोर जुल्म की दिवारों से ना डरते हैं अंगारो से

आग उठी है अंतर में सुलगाता हीं रहूंगा

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उदय शंकर चौधरी नादान

कोलहंटा पटोरी दरभंगा बिहार

7738559421

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