#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

उठो जवानो कर प्रयाण

बज उठी अरे रणभेरी है

असमंजस का समय नहीं ये

किस बात की देरी है

 

घर और सड़क सरहद पर

नजर जमाए हीं रखना

चाल चले ना फिर कोई

यहाँ भारी हेरा फेरी है

 

चैन से ना जीने देंगे

हैं जगह भरी मक्कारों से

जोर जूल्म दहशत वाली

ये रात बड़ी अंधेरी है

 

होठों पर हैं मुस्कानें

राज दिलों में है भारी

झाँसे में उनके मत आना

दिखने में कच्ची केरी है

 

कदम बढ़ाना सोच समझ के

तुम पर भारी पहरें हैं

चूक न कोई हो तुमसे

घर में हीं अपने बैरी है

 

करना होगा तम दूर ‘उदय’

धरती आकाश तुम्हारा है

जो आग उठे हैं सीने में

जलने दे क्यों देरी है

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उदय शंकर चौधरी नादान

कोलहंटा पटोरी दरभंगा

7738559421

 

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