#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

जलता सूरज तपता किसान,
होता देश समृद्ध महान।
रग-रग से बहते स्वेद बूँद,
तपते तन-बदन और मुंड।

बरसे ना मेघा अम्बर से,
अग्नि बरसते अम्बर से।
तन से झड़ती है सावन,
आग उगलती है सावन।

जैसे हों ये रुठे बादल,
आओ बादल बरसो बादल।
देखो अब धरती जलती है,
पशु पक्षियां मरती है।

अम्बर में श्याम घटा छाओ,
आओ मेघा आओ-आओ।
देखो मन बड़े अधीर हुए,
असह्य पीर गंभीर हुए।

तुम हो गर अपने जिद पर,
हम हैं अ़ड़े अपने जिद पर।
खेतों से यूं ना जाएंगे,
खुद को और तपाऐंगे।

हूँ किसान मैं तपी व्रती,
माँ है मेरी ये धरती।
ये देगी ममता कीआंचल,
उर्जा शक्ति बल सम्बल।
——
उदय शंकर चौधरी नादान
कोलहंटा पटोरी दरभंगा
7738559421

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