#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

अंतर्द्वंद छिड़े मन में, ह्रदय बीच अंगार उठा है।
है उठी ज्वाल अंतर्मन में, पौरुष हुंकार उठा है।

हुई घोर घनघोर निशा, करती धरती आर्तनाद।
सुन आर्त हुए मन स्पंदित, शाॅर्य दहाड़ उठा है।

है द्वंद जगत के पापों से, निष्ठुरता अभिशापों से।
कहलाएंगे हम भी कायर, शत्रु ललकार उठा है।

कहते हैं अब लोग कवि, कलम धरुं या कटार।
किसान खेत में बिलखे, सरहद चीत्कार उठा है।

है द्वंद यही मेरे मन में, कविता करुं या सिंहनाद।
विस्मित हूँ गर्व गीत लिखू, यही उन्माद उठा है।

रचूं सुनहरे गीत ‘उदय’ या प्रलय गान फिर गाऊं।
है ज्वर ग्रस्त सारा समाज, ये मर्म विचार उठा है।

दुबिधा दुर हुई कलम से , असि की बात करेंगे।
भुजा फड़कने लगे हैं जैसे, गांडीव टंकार उठा है।

हूँ धर्म धरा का मैं ‘शंकर’, जग हित जहर पिए हैं।
युगधर्म निभाने फिर तांडव, करने का भाव उठा है।
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उदय शंकर चौधरी नादान
कोलहंटा पटोरी दरभंगा
7738559421

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