#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

आओ हम अपने लहू से, एक नया इतिहास लिखें।
पाप से व्याकुल धरा, बलिदान हमसे मांँगती है।

आ गया है वक्त वो, चुपचाप हम कैसे रहें।
हैं ऋणी हम जिनके वो, अधिकार हमसे मांँगती है।

फिर कोई रावण न सीता, को हरे अब छल करे।
देनी न हो अग्नि परीक्षा, मान हमसे मांँगती है।

जाओ जाकर कौरवों को ये मेरा पैगाम दे दो।
चीखकर फिर द्रौपदी, सम्मान हमसे मांँगती है

मौन अर्जुन भीम क्यों हैं, भीष्म क्यों मजबूर हैं।
द्रौपदी के बाल अब, श्रृंगार हमसे मांँगती है।

अब न कोई दामिनी, ना निर्भया मजबूर हो।
दो वचन मुझसे ये हक, हिंदुस्तान हमसे मांँगती है।
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उदय शंकर चौधरी नादान
कोलहंटा पटोरी दरभंगा
7738559421

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