#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

गई शीत पतझड़ गुजरी आया बसंत हर्षित जग वन है

कोयल गाती गीत मधुर पुलकित धरती और गगन है

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सजी प्रकृति है दुल्हन सी मादकता मधुमाई है

मनमोहक मुस्कान लिए वन उपवन ली अंगराई है

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तरुवर में कोपल लगते बासंती रंग मचलता है

बैठ पतंगे मंजर पे डाली-डाली  खिल उठता है

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जैसे सोलह श्रृंगार किए वनदेवी वन में उतरी हो

बैकुंठ सी आभा को लेकर अन्नपुर्णा जग में उतरी हो

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देख मनोरम दृश्य मनुज भी आलस उतार फेकता है

सुरज की मीठी किरणों में सारा प्रमाद फेकता है

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जीवन भी तो है एक बसंत इस में भी पतझर आती है

मन ग्रीष्म तो तन शीत नयन बरस हीं जाती है

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जो तज विकार उस तरुवर सा जग जीवन में खिल जाता है

उनके जीवन में बसंत सा नवयौवन भर जाता है

 

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