#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

गई शीत पतझड़ गुजरी आया बसंत हर्षित जग वन है

कोयल गाती गीत मधुर पुलकित धरती और गगन है

—–

सजी प्रकृति है दुल्हन सी मादकता मधुमाई है

मनमोहक मुस्कान लिए वन उपवन ली अंगराई है

—-

तरुवर में कोपल लगते बासंती रंग मचलता है

बैठ पतंगे मंजर पे डाली-डाली  खिल उठता है

—–

जैसे सोलह श्रृंगार किए वनदेवी वन में उतरी हो

बैकुंठ सी आभा को लेकर अन्नपुर्णा जग में उतरी हो

—–

देख मनोरम दृश्य मनुज भी आलस उतार फेकता है

सुरज की मीठी किरणों में सारा प्रमाद फेकता है

—–

जीवन भी तो है एक बसंत इस में भी पतझर आती है

मन ग्रीष्म तो तन शीत नयन बरस हीं जाती है

—-

जो तज विकार उस तरुवर सा जग जीवन में खिल जाता है

उनके जीवन में बसंत सा नवयौवन भर जाता है

 

54 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *