#Kavita by Uday Shankar Chaudhri

है कहाँ नजरें किसी की वेदना को पढ़ सके

दर्द की दीवार करने ध्वस्त उपर चढ़ सके

 

चांद तारे देखने वाले जमीं पर देख तुम

ना अंधेरा और की आँगन में जाकर पढ़ सके

 

यूं तो नारे रोज हीं लगते हैं उससे क्या मिला

है यहाँ कोई नहीं जो उजरे हुए को गढ़ सके

 

शोर कागज पर बहुत होते हैं नित अखबार में

दर्द का दरिया भयानक बाँधने कोई बढ़ सके

 

अाज मतलब रह गया बस आदमी को पेट से

जंग लड़ने और का निज फर्ज से खूद बँध सके

 

आशियां बिखड़ी पड़ी है किसने लूटा क्या पता

है कहाँ हिम्मत किसी की बात इतना कह सके

 

आज ये सूरज की किरणें क्यों नहीं आती यहाँ

धूंध है बत्तीयाँ जलादो तम अंधेरी छंट सके

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उदय शंकर चौधरी नादान

कोलहंटा पटोरी दरभंगा बिहार

7738559421

 

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