#Kavita by Uma Mehata Trivedi

    ‘एक पूर्ण विराम…।

तुम्हारें अक्षरों के हर अक्षर में,

 अनेक स्वर-व्यंजन गुम हें..

 तुम्हारें शब्द तुम से हीं खामोश,

 वहीं तो…,

 पता नहीं तुम्हें…?

 अब हमझ जाती हूँ..

 अनकही,अनबुझी ओर अनजानी-सी..

 अक्सर लिख जाती…

 असंख्य कोरे-कोरे कागजों को,

 नीले रंगों से रंगती रहती हूँ…

 पता है तुम्हें…?

 कुछ-कुछ रह जाता,

 वो रंग बिखरा-सा..

 सोच जिसे मुस्कुराती हूँ..

 चुन-चुनकर समेटना चाहती हूँ..

 हजारों रंगीन धागों में

 अपार स्नेह रूप में पिरोकर

 शब्द-साधना में जोड़कर…

 तारों को वीणा में…

 कलियों को पुष्पों में…

 और….

 स्वयं की धुन को सृजन से…

 इन व्यंजनों से जाहिर करती हूँ…

 एक सत्य-विश्वास

 ऊँचाई,नदियों-सी सच्चाई

 प्रेम-प्रीत की निराली छबि

 लहराती लहरों के स्वर सागर द्वारा

 किनारों तक कदम बढ़ाना चाहती हूँ

 कोई अल्प-अर्ध्द विराम नहीं..,

 एक पूर्ण-विराम से कहना चाहती हूँ..।

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