#Kavita Ved Pal Singh

गिरेबां तेरा भी कितना खराब……….

तिल-तिल कटती है रोज़ जिंदगी,

उम्र यूँ ही कट जाती है तमाम।

ख्याल कर लें अगर पराये दर्द का,

ता उम्र रहे आराम ही आराम।

 

क्यूँ झगड़ता रोज किस किस से,

क्या लेना है और क्या है तेरा।

जहाँ से तू आया वहीं तो जाना है,

यहां कुछ दिन का रैन बसेरा।

 

ज़रा भूल कर तो देख अपना दर्द,

कराहता दिखेगा सारा जहान।

सब मोह और लालच का खेल है,

हकीकत से बने सब अनजान।

 

दूसरों को सताकर नहीं मिटता है,

दर्द अपना कभी यूँ ओ जनाब।

मत कोस जमाने को जरा देख तो,

गिरेबां तेरा भी कितना खराब।

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