#Kavita by Ved Pal Singh

आज तक – 1

जी कर भी जिंदगी से ना मै रूबरू हो पाया हूँ आज तक,

पाल कर भी चाहतों को ना किसी को चाह पाया हूँ आज तक।

 

तमन्नाओं के उलझे सिलसिले हैं जो दूर तक जाते हैं,

तरसाते हैं तड़पाते हैं और बस यूँ ही चिढ़ाए जाते हैं,

मगर उनसे लड़ने का मैं हौसला नही जुटा पाया हूँ आज तक।

 

ख्वाहिशों की गफलत में बुझा बुझा सा रहे जाता हूँ,

अपनी बेबसी की कहानी मैं खुद से ही कहे जाता हूँ,

मुँह खोलकर ये सब किसी को नही बता पाया हूँ आज तक।

 

पस्त होता हूँ गर जगने से तो कभी सो जाता हूँ मै,

सरसरी सी नींद के बोझिल सपनों में खो जाता हूँ मै,

क्या कहूँ मै सपनों में भी नहीं लुत्फ़ उठा पाया हूँ आज तक।

 

कट जाती है जिंदगी मौजों से अलग रहने पर भी,

रूह तो रहती है पाक पिंजर के दुःख सहने पर भी,

मै बस ये ख़ुशी की बात खुद को समझा पाया हूँ आज तक।

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