#Kavita by Ved Pal Singh

अब क्यूँ सदा देते हो

दूर सरकते क़दमों को क्यूँ रोक लेते हो तुम,

भर्रायी आवाज में अब क्यूँ सदा देते हो तुम।

 

रिश्तों की दुहाई देकर यूँ मुझे बेचैन ना करो,

ढलता ही सही मेरे दिन को तुम रैन ना करो,

शांत दिले समंदर में क्यूँ नाव खेते हो तुम।

 

चाहता था ता-उम्र तुम्हारे ही साथ रहना मै,

मौजों की रवानगी में तुम्हारे साथ बहना मै,

सदमा हुआ जब देखा कि घाव देते हो तुम।

 

झेले तुम्हारे नश्तर मगर जिक्र नही किया,

चसकते हुए घावों का भी फ़िक्र नही किया,

कहर बरपा करके भी हलके में लेते हो तुम।

 

सारा नाता तोड़ लिया आजिज आकर मैंने,

ली कसम इकले रहने की काबा जाकर मैंने,

मेरी कमी भी भर लोगे जैसे भर लेते हो तुम।

 

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