#Kavita by Ved Pal Singh

सम्भलकर जियो जिंदगी…………..

वैसे तो तुम्हारे क़दमों की डगर मेरे अख्तियार में नही,

अगर मेरी मानों तो नेकी की राह पकड़ कर चलने लगो।

 

जुदा-जुदा और मुतज़ाद सबक हाज़िर हैं जो चाहो सुनों,

आजाद हो मौत के इस पार तुम जो चाहो मंज़िल चुनो,

ऐसा ना हो कि पहुँच जाओ जहाँ खुद बखुद जलने लगो।

 

चलने के लिए जिंदगी की डगर हैं इस जहां में बेशुमार,

कहीं मस्ती कहीं लुत्फ़ है और कहीं है शमशीर की धार,

छाँट लेना खुद सम्भल कर ना हो कि हाथ मलने लगो।

 

खुदी परिवार कुनबा समाज इन्हीं से तुम्हे गुजरना है,

इन्हीं में रहना है इन्हीं में जीना और इन्हीं में मरना है,

खींचेंगें टांग हमेशा तुम्हारी पहले से ही सँभलने लगो।

 

जिंदगी कोई मज़ाक नहीं है यहाँ तो बड़े-बड़े छले गए,

बहुत से आये सूरमां बनकर और फिसलकर चले गए,

ऊँची चढ़ाई है जिंदगी कहीं तुम भी ना फिसलने लगो।

 

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