#Kavita by Ved Pal Singh

दहशतगर्दों की रूहें ……………
काबिले बददुआ हैं वे सभी जमींदोज़ रूहें,
जिन्होंने जीते जी गलत काम किया था।
कबीलों की आड़ में बने रहे मज़हब वाले,
और दहशत को ही बस अंजाम दिया था।

खुद तो चले गए कब्र में आराम फरमाने,
छोड़ गए जिन्हे दहशत के लिए ही पाला।
काफी मुश्किलों से बना था जहां गुलिस्ता,
इन नाफ़रमानों ने इसे दोजख बना डाला।

मज़हब के नाम पर सियासत करने वाले,
बन्दों के बीच अजब दीवार खड़ी कर गए।
ऐसी खींच गए सरहद मजहब के नाम पर,
ना मिट रही दिलों से जो वो खुदी भर गए।

आमीन रटते रटते जिनके गले सूखते थे,
ये उन्ही बन्दों पे जुल्म तारी करते रहे थे।
अपने हम वतनों को खुद्दारी पढ़ा पढ़ा कर,
पराये वतन से अपनी झोली भरते रहे थे।

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