#Kavita by Ved Pal Singh

सुबह होने को है ……..
ये रात चुप चुप सी है तारे हैं मदहोश,
चाँद की खबर नही कायनात खामोश।
फलक है मुँह खोल रहा मुस्कुराने को,
बस सुबह होने को है अँधेरा चुराने को।

अँधेरी रात आखिरी सांस ले रही है,
जैसे सैलाब में टूटी कश्ती खे रही है।
बस थोड़ी देर बाकी है सुबह होने में,
अंधियारे को धरती से जुदा होने में।

पौ फटेगी और एक शोला निकलेगा,
आफ़ताब बनकर एक गोला उभरेगा।
तब नींद से जगेगा सोया हुआ सवेरा,
कायनात में होगा उजाले का बसेरा।

चप्पा चप्पा रौशनी में नहाया होगा,
रंगों ने सारे जहां को सजाया होगा।
रंगबिरंगी चिड़ियों की बोली सुरीली,
शबनम से होगी फ़िज़ा गीली गीली।

हवाओं में खुशबू होगी ताज़गी होगी,
हर ज़र्रे में एक नई सी जिंदगी होगी।
फूलों के आँगन में कलियाँ चटकेंगीं,
भँवरों का नाच होगा शाखें मटकेंगीं।
……. वेद पाल सिहँ

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