#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

अोह ! री माँ

 

अपने घर की माँ की बात दबायी जाती है

दूसरे घर की माँ की बात उठायी जाती है

 

जिंदगी की जिस लाचारी में दीखती है माँ

आग लगे नहीं कभी,आग दबायी जाती है

 

झाड़ू माँ देती है पोछे भी माँ लगाती है

दो बातें बोल, माँ से चाय मंगायी जाती है

 

बड़ी कढ़ी के क्या दिन बीत गये माँ के

टूटी थाली में रात की दाल मंगायी जाती है

 

अोह री माँ तुम मेरी न माँ हुई इस जन्म में

हर दिन तुम अश्रु की धार रूलायी जाती है |

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

206 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.