#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

चूल्हे नहीं जलते

 

अड़े हैं लोग

 

चौक चौराहे पर

झंडे लिए

नारे बुलंद किये

 

” हमारी मांगे पूरी हो ”

 

बाजार के लोग

 

करते हैं आकलन

तंग आ गये हैं हम

एेसे लोगों से / नारे से

 

जब मन आया – निकाल दिये

रैली / कर दिये सड़क जाम

 

घंटों पहर

 

सड़क जाम में फंसी रही

 

मरीज की गाड़ी

 

नारे में दब गई जिंदगी

 

परिजन पीटते रह गये छाती

 

हाय री सोच / हाय री समझ की रैली

तुम कितनी है अच्छी / कितनी है नीयत की मैली

 

कैसी निर्मम है तुम/कैसी है तुम्हारी कार्यशैली

 

यह बंदी

बंद कर देती है – कितने घर की

रोटियाँ

रोते रोते सो जाते हैं बच्चे

 

चूल्हे नहीं जलते

 

रोजमर्रा की जिंदगी के घर

 

तुम हो कि

 

फैल जाती हो ऊच्ची आवाज में

राजधानी तक

 

आवाज नहीं पहुँचती तो

बस असहायों की

 

कोई नहीं सुनता तो

बस असहायों की

 

लेकिन

 

कल असहायों की भी आवाज़

सूर बांधेगी / एकता लायेगी

ताकत दिखायेगी

 

पहुँचेगी राजधानी तक |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

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