#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

देश प्रगति के पथ पर बढ़े हर पल

 

क्या हमें बोलने का अधिकार है

जो हम बोलते हैं तुम्हें स्वीकार है

 

कानों में कभी डाले जाते थे शीशे

वैसी हवा के हुए कितने शिकार हैं

 

जमाना रहा नहीं वो आदतें बदलो

पुरानी तो नहीं तेरी वही तलवार है

 

जातवाद देश के घोर जहर है यार

वही जहर पीने का फिर विचार है

 

देश प्रगति के पथ पर बढ़े हर पल

कुल्हाड़ी फेंकोगे या नया प्रहार है

 

पैर फैला रही हैं उन्मादी नीतियां

दोनों के हाथ अंंगार ही अंगार है

 

माँ कब चाहती है बेटे बंट जायें

दिल में ममता है दूध में प्यार है |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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