#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

फूल तोड़ती लड़की

 

फूल तोड़ती लड़की

बिल्कुल

प्रसन्न दीखती है

 

काँटे

बेधते हैं ऊगलियाँ

 

बावजूद भी

 

वह

बढ़ती तोड़ती है

दूसरी और तीसरी

 

डाल की खिली – कलियां

 

वह

व्यवहार नहीं बदलती

 

काँटे को

बाधक नहीं मानती

 

बताती है – रक्षक

 

वैसा रक्षक

संसार में ढूंढे

नजर नहीं आता

 

उसे

सौंदर्य से आकर्षण नहीं

 

चाह बनी है तो

बस बनी है – फूल की

 

हिफाजत की / भावना

बनी है शहादत की

 

लड़की निडर है

 

कांटे से

 

कांटे चूभेंगे/खेलेंगे नहीं

जैसे खेलते हैं लोग

दामन से

 

काँटे का इतिहास जान

चुकी है वह

 

फूल तोड़ती लड़की

 

इत्मिनान है

 

डरती है तो बस

दुनिया की हवा से /

जमाने की दृष्टि से |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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