#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

विनय सुनो माँ

 

माँ, मूक भाषा/कौन समझेगा/माँ तेरे सिवा

 

सबकी माँ हो/मैं सच कहता हूँ/परख लिया

 

शिथिल पड़े/यूँ जीवन के गीत/कल्याण करो

 

आनंद भरो/जीवन हो दायिनी/तम तो हरो

 

उठी लेखनी/बस तेरे भरोसे/पार करोगी

 

चाहे जैसे भी/री अंतस में मेरे/ज्ञान भरोगी

 

बेटियाँ सारी/बिलख रहीं नित/कह न पाती

 

अँखियां मेरी/सदा बहती बस/सह न पाती

 

दहेज लोभी/बन गया है भक्षी/चादर अोढ़

 

फैल रही है/विषमता ही माता/कैसी है कोढ़

 

ज्ञान दायिनी/विवेक दिये जा माँ/विनय सुनो

 

हँसेंगे लोग/कैसी हो माँ तुम/विनय सुनो |

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

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