#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

चढ़ावा

 

फाइलें

 

फांक चुकी हैं

 

टेबुल टेबुल की

 

धूल

 

कुछ पेंशन की है कुछ अन्य

 

जरूरत की

 

पता नहीं

 

वह अब क्या फांकेगी – मुझसे

 

छोटे लोग

 

छोटी छोटी राशियाँ फांकते हैं

 

और…. और… बड़े बड़े लोग

 

बड़ी राशियाँ

 

बात चिंता की है

 

बेड की चादर बदली नहीं

 

जा सकी है पीछले

 

दो साल से

 

परेशान रहता हूँ

 

घर की रोटी नमक और

 

दाल से

 

घिर गया हूँ काफी सवाल से

 

मेरे पास अब बचा ही

 

क्या है

 

आदमीयत के सिवा

 

जो दूँगा फाइल पर

 

चढ़ावा |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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