#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

विवशता की जीत हुई

 

चाचा कर दिये अलग

 

चाची भी हो गयी जुदा

 

हम अवाक रह गये की

 

तेरी दुनिया यही है खुदा |

 

स्वार्थ में लोग पलते थे

 

स्वार्थ की राह चलते थे

 

निजता कैसी निजता ?

 

मूंग छाती पर दलते थे |

 

थे पिता तो साथ सभी थे

 

बेसहारा, अनाथ सभी थे

 

किन्तु खुल गई  सच्चाई

 

स्वार्थ बस, साथ सभी थे |

 

करेगी माँ अब कैसे भरण

 

जाऊँ तो मैं किसके शरण

 

ईश तुम  पर  रहा भरोसा

 

आता हूँ हूँ आता तेरी शरण |

 

हुई जिंदगी पल्लवित हुई

 

नई जिंदगी की गीत हुई

 

व्यथा में तुम थे साथ प्रभु

 

विवशता की  जीत हुई |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

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