#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

बरगद की छाया नहीं घरों पर

 

मांग रहे हैं भूखे बच्चे मेरे रोटी दो माँ रोटी दो

 

बड़े भैया को बड़ी, किन्तु मुझे उनसे छोटी दो |

 

भूख कहाँ मानती है बातें, पेट में आग धधकती है

 

कहाँ नसीब, मेरे घर रोटियाँ, दोनों वक्त पकती हैं |

 

कैसे कहूँ भूखे बच्चों को, तेरे पिता कब आते हैं

 

कड़ी मेहनत करते हैं, किलो भर ही आटे लाते हैं |

 

जिस दिन बंदी होती है उस दिन उपवास होता है

 

आँचल पकड़ माता के आगे बच्चा बच्चा रोता है |

 

अपने गाँव शहर का यह जीता जागता तस्वीर है

 

किसी आँखों में खुशी भरी किसी आँखों में नीर है |

 

दलितों की रिक्सवानों की फुट पाथ जिंदगी दुकानों की

 

आत्मा में पीड़ा होती है सोचती हूँ उन मकानों की |

 

बरगद की छाया नहीं घरों पर क्या हालात होगी

 

बेटियाँ रह गयी होगीं कुँआरी फिर  गई बारात होगी |

 

सोच रही हूँ इस हालात की किसकी है जिम्मेवारी

 

आधे घर में चूल्हे जलते हैं बेटियाँ

आधी है  कुँवारी |

 

सपने ही नहीं माँ की आँखों में पलती है संवेदना

 

मुश्किल है उन आँखों में सोच कोई तीर भी भेदना |

 

माँ का हृदय आहत होगा तो संशय में कवि होगा

 

जो सवाल कल तक उपजा है वही आज भी होगा

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

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