#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

कविता

 

यह घर मंदिर है माँ

 

वसन घटे और कम हुए कैसे माँ

 

कह बताऊँ

 

प्राय: अंग दिखते हैं तेरे भाग्य पे

 

कैसे इतराऊँ |

 

क्या जरूरत पड़ी माँ साड़ी तुझे

 

हटाने की

 

चली आ रही सभ्यता बिन सोचे

 

मिटाने की |

 

दूधमुँहा बच्चा हूँ मैं तुतली भाषा

 

आती है

 

निरासा बढ़ती जाती है आशा हमें

 

बताती है |

 

दादी कहती है तेरे पिता मेरे

 

आँचल खेले थे

 

पिये दूध दुबक दुबक कोई कष्ट न

 

झेले थे |

 

भाग्य फूटे मेरी री माँ जीन्स ने

 

आँचल छिन लिया

 

जा रही मार्यादाएँ मिटती रीति को

 

छिन्न भिन्न किया |

 

टूट जाता है जब खिलौना मैं

 

उदास यूँ होता हूँ

 

सोचो माँ सोचो एक बार कितना

 

मैं यूँ रोता हूँ |

 

बोतल के दूध मेवे मिश्री क्या

 

भूख मिटायेंगे

 

हम बच्चे भूखे रहेंगे आँचल का

 

दूध न पायेंगे ?

 

दादी को लोरियाँ आती हैं तुम

 

कहाँ  जानती हो

 

दादी से इर्ष्या करती हो दादी को

 

दासी मानती हो |

 

यह घर मंदिर है माँ बनी पवित्रता

 

रहने दो

 

सभी सभी के मित्र दीखे बनी

 

पवित्रता रहने दो |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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