#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

धुम्रपान की जिंदगी बेकार होती है

जीत नहीं आदमी की हार होती है|

 

अक्षम होती हैं कोशिकाएँ चलती चलती

टिकती नहीं ढहती सी दीवार होती है |

 

व्यथा अलग खर्च अलग बेहिसाब

आमदनी भी थकती सी लाचार होती है |

 

मौका रहते समझ नहीं आती कभी

नैया फँसी उफनती सी धार होती है |

 

बुरी आदत से परेशानी और आती है

छोटी सी परिवार की सरकार होती है |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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