#Kavita by Vidhya Shankar Vidhyarthi

कविता

 

भारत माँ की बेटी तुम

 

तेरे भाग्य में नहीं है बेटी लिखा कोई सहारा

 

वायदे हैं झूठे सभी के और री झूठी है नारा |

 

कर्म की लकीरें बदलो और बदलो तकदीर

 

चल पड़ी हो जिस राह में पीछे न मुड़ना फिर |

 

सुबह की हवा क्या, क्या बदलेगी शाम की

 

हवा बस हवा होती है होती है वह नाम की |

 

मौका आये तो बेटी तुम दरिंदों से लड़ लेना

 

रोटी की राह में निकली, अड़ लेना अड़ लेना |

 

सत्ता की आँखें नहीं री दिल है पाषाण बने

 

देखी है खूनी क्रांति निष्ठुर तलवार कृपाण बने |

 

भारत माँ की बेटी तुम बेटी का फर्ज निभाना

 

भार खिचना भार उठाना भार की रोटी खाना |

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

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