#Kavita By Vidhya Shankar Vidhyrathi

नारी बस नारी रहेगी

बोलो माँ तेरे इस आँगन में कितने रूप हजार हुए
कभी दीदी फुआ कभी रिश्ते इतने हजार हुए ।

एक ही मंत्र तूने दी नारी आदरणीया होती है
बहन बने या भार्या बने भार सबकी वह ढोती है ।

बहन बन विनोद करती है पत्नी बन साथ निभाती है
कोयल गाये या न गाये सारी जिंदगी वह गाती है।

कली की तरह खिल जाती है कली सी मुरझाती है
उफ नहीं सांसो की करती है भले ही वह टूट जाती है।

लोग हैं कि अलग अलग दृष्टि से नारी को देखते हैं
और भी कितने लोग हैं यहां कि लाचारी को लेते हैं।

धिक धिक दृष्टि की उनकी नारी सतायी जो जाती है
खुशी बाँटती बाँटती जीवन में मुरझायी जो जाती है।

मेरे जीवन के इस आँगन में नारी बस नारी रहेगी माँ
मैं भी जब हँसूगा जीवन में तो वह भी हँसती रहेगी माँ ।

विद्या शंकर विद्यार्थी

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