#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

–:अनेकता में एकता :–

 

किसकी करूँ  मैं पूजा, किसको करूँ प्रणाम ।

हैं  शारदे  गजानन ,सृष्टी  के  चारो धाम।।

 

यदि थोडी़ वो विनय सुन,कुछ बात मान जायें,

चरनों में जगह देकर ,सद् भावना जगायें,

फिर ऑसुओं के गहरे,वह सिन्धु में नहायें,

प्रतिबद्धता हृदय की,कहलाये राम राम–

 

अह्लाद  की अवस्था,सन्देश देती जाती,

जब लेखनी चले तो,परिदृष्य से मिलाती,

दिखने में सौम्य सुन्दर,शालीनता निभाती,

रस चेतना अगम हो,आराधना सकाम–

 

आगे  बढे़  कदम  तो, अनुरक्त चारु चन्दन,

बिष से बिषय बडा़ हो,अरु भावना में वन्दन,

कल्यान की दिशा दे,मोही का मोह बन्धन,

परिवेष में सगुणता,अनुबन्ध श्याम श्याम——

 

फिर जीवनी सृजित हो,उल्लास “भ्रमर” जागे,

पर सत्य सामने हो,शिव कल्पना के आगे,

अंतिम चरण का सावन, निश्तब्धता न मॉगे,

सम्वेदना से मोहक,परमात्मा का नाम–

 

किसकी करूँ मैं पूजा, किसको करूँ प्रणाम ।

हैं  शारदे  गजानन ,सृष्टी  के  चारो धाम।।

“भ्रमर”Ⓜ+919453510399

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