#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

—:दया दृष्टि:–

 

दाता की दया दृष्टी ,हम  हिय  में बसाते हैं।

जो भाव मिला निर्झर, उसे गाके सुनाते हैं।।

 

जब जब भी निशाचर,ने उत्पात मचाया था,

तब मानव जनम लेकर ,तूने रास रचाया था,

भावों की हुयी  वर्षा, संयोग  बना  कोमल,

संसय की दूर किरणें,ममता का खुला ऑचल,

हर पग पे गूढ़ युक्ती,उल्लास पूर्ण साधन,

वसुदेव सगुण मथुरा, गोकुल को बताते हैं—–

 

पापों की लिये गठरी,फिरता जो अजामिल था,

उसे मुक्ति दिलाने में, तेरा नाम ही शामिल था,

शुचिता की धनी मूरत,अज्ञान विधाओं से,

तापों ने मला कुचला,अपनी ही निगाहों से,

चरनों की बढ़ा गरिमा,पत्थर को दिया जीवन,

दुखियों के मिले आश्रय,त्रय ताप मिटाते हैं—-

 

भक्तों की रखी लज्जा,विश्वास ठिकाने से,

सुरधाम गयी गणिका, तोते को पढ़ाने से,

राना ने दिया प्याला,सन्ताप भरे बिष का,

श्रद्धा की बढ़ी अँजुरी,ले नाम संवरिया का,

तब तूने बढ़ा पल्लू,मर्यादा करी सिंचित

मुठ्ठी में भरा वैभव , घनश्याम लुटाते हैं——

 

मन बोध हुआ पागल,गम्भीर नही दिखता,

उद्देश्य मयी जीवन,अवधूत  बना  फिरता,

अब सुनलो”भ्रमर” विनती,विश्वास नही टूटे,

सन्सार  लगे  सपना ,तन  भोग  यहीं  छूटे,

मझधार बीच निष्ठा ,हनुमान विदुर चाहत,

उस पार लगे नइया, हम तुमको रिझाते हैं—-

शबरी का घिसा चन्दन,तुलसी भी चढ़ाते है—

 

नोट:–(पौराणिक पात्र घटनाओं को ध्यान

रख पदावली काआनन्द लें ?)

 

रचयिता प्रेषक:–

विजय नारायण अगरवाल “भ्रमर”

 

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