#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

-:भजन:–

 

विनती सुन लो राम गुसांई।

जग  में  हमरो  दूसर  नाई ।।

 

यज्ञ वेदि  औ  जाप  कराऊँ,

नाना विधि मन को समझाऊँ,

रास  करम  की गति न आवै,

पूर्व  जनम  की करम कमाई—–

 

यक  पीड़ा  से घर भर कॉपत,

नकुल नयन का सबको सांसत,

असमंजस   में  व्यथा   पुरानी,

नित – नित हाड़त दारु दवाई——-

 

ग्रसित ताप से अनुपम जीवन

वासित निगुण भाप से ऑगन,

लक्ष्य   दिखे  न   कोई  आगे,

दुख  की  दूर  करो  परछॉई——

 

भ्रम  का  दरपन  दूर  हटाओ,

मन से  कुछ  संकल्प दिलाओ,

रसमय  जीवन  करे  उजियारा,

“भ्रमर”की जग में होत हंसाई—–

 

“भ्रमर “रायबरेलवी

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